Thursday, January 7, 2010

Tuesday, January 5, 2010

मतदान से पहले

आप सोचते होंगे कि अख़बारों में सिर्फ़ एक पेज 3 होता है? लेकिन महाराष्ट्र के अख़बार ऐसा नहीं मानते। हाल के चुनाव में उनके पास कई पेज 3 थे, जिन्हें वो लगातार कई दिनों तक छापते रहे। उन्होंने सप्लिमेंट के भीतर सप्लिमेंट छापे। इस तरह मुख्य अख़बार में भी आपको पेज 3 पढ़ने को मिले। फिर उन्होंने मेन सप्लिमेंट में अलग से पेज थ्री छापा। उसके बाद एक और सप्लिमेंट जिसके ऊपर रोमन में पेज थ्री लिखा था।

यह मतदान से ठीक पहले के दिनों में बहुत ज़्यादा हुआ क्योंकि व्यग्र उम्मीदवार “ख़बरों” को खरीदने के लिए हर क़ीमत चुकाने को तैयार थे। एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि “टेलीविजनों पर बुलेटिन्स की संख्या बढ़ गई और प्रिंट में पन्नों की संख्या।” मांगें पूरी करनी थीं। कई बार तो आखिरी पलों में अतिरिक्त पैकेज आए और उन्हें भी जगह देनी थी। उन्हें वापस लौटाने का कोई कारण नहीं था?

मराठी, हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू – राज्य के तमाम अख़बारों में चुनाव के दौरान आप ऐसी कई आश्चर्यजनक चीजें देखेंगे जिन्हें छापने से इनकार नहीं किया गया था। एक ही सामाग्री किसी अख़बार में “ख़बर” के तौर पर छपी तो किसी अख़बार में “विज्ञापन” के तौर पर। “लोगों को गुमराह करना शर्मनाक है” – यह शीर्षक है नागपुर (दक्षिण-पश्चिम) से निर्दयील उम्मीदवार उमाकांत (बबलू) देवताले की तरफ़ से खरीदी गई ख़बर की। यह ख़बर लोकमत (6 अक्टूबर) में प्रकाशित हुई थी। उसके आखिरी में सूक्ष्म तरीके से एडीवीटी (एडवर्टिजमेंट यानी विज्ञापन) लिखा हुआ था। द हितवाद (नागपुर से छपने वाले अंग्रेजी अख़बार) में उसी दिन यह “ख़बर” छपी और उसमें कहीं भी विज्ञापन

Saturday, January 2, 2010

पंचायत चुनाव २०१०

पंचायत चुनाव २०१०

पंच-सरपंच के अलावा पंचायत सदस्य बनने की होड़
इन दिनों जिले के ग्रामीण इलाकों में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर काफी उठापटक चल रही है। गांव-गांव में अब पंच-सरपंच से लेकर जनपद और जिला पंचायत सदस्य चुने जाने वालों के नामों पर अटकलों का दौर शुरु हो गया है। ग्रामीण अंचलों में दिनभर का काम निपटाकर फुरसत में बैठे महिलाओं, बुजुर्गं और युवाओं समेत कमोबेश सभी तबकों में प्रत्याशी चयन पर विचार-विमर्श चल रहे हंै। नगरीय निकायों के बाद अब ग्रामीण हल्कों में भी पंचायत प्रतिनिधि चुनने की होड़ है। वहीं पंचायत चुनाव के उम्मीदवार भी पंचायत प्रतिनिधि बनने की मंशा से दिग्गज नेताओं से संम्पर्क साध रहे हैं। कहीं-कहीं पर क्षेत्र की जनता में प्रत्याशियों के नामांकन दाखिले के बाद नये साल पर नये प्रतिनिधि चुनने की कवायद भी चल रही है। अमूमन, यही हाल समूचे जिले के ग्रामीण क्षेत्रों का है। एक ओर चुनाव जीतने लायक लोकल नेताओं की शिद्दत से खोज-परख हो रही है, तो दूसरी ओर पंचायत पदाधिकारी बनने की प्रत्याशा में लगे उम्मीदवार ठोस राजनीतिक धरातल की ऐसी संभावना टटोल रहे हैँ, जहंा चुनाव जीतने में अधिक बाधा न आए। करीब साल भर से पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी थी। अंदेशा है कि पंचायत चुनाव में किस्मत आजमां रहे प्रत्याशी विजयश्री हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। नामांकन दाखिले के बाद अब प्रत्याशी अपनी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ाने में लगे हैँ। यही नहीं, बल्कि कई छुटभैय्ये नेता तो खुद अपने मुंह ही मियां मिट्ठु बन रहे हैं।
दूसरी ओर, ग्रामीण मतदाता भी चुनावी $िफज़ा से अलहदा नहीं है। अपने से सम्पर्क साधने वाले कमोबेश सभी उम्मीदवारों को दिलासा दे रहे हंै। अलबत्ता, अब ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो नतीजे ही तय करेंगे। हाल के बरसों में हुए पंचायत चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब ग्रामीण मतदाता भी चतुर-सुजान हो गई है। एक ओर जहंा, चहुंओर समर्थन मांग रहे उम्मीदवारों की उम्मीद को जिंदा रखे हुए है, तो दूसरी ओर चुनावी मौके का पूर्ण दोहन करने की साजिश भी कर रहे हैँ। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक इस बार पंचायत चुनाव के उम्मीदवार प्रचार-प्रसार के साधन अलावा दबंगों की भी तलाश में जुटे हुए हैं। उम्मीदवारों द्वारा मतदाताओं को रिझाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने का दौर शुरू हो चला है।